Rash(रस) For Class 10,12 and B.A Student's by Bajrang Prasad.
रस
* रस किसे कहते हैं ?
उत्तर – किसी कविता, काव्य, कहानी, उपन्यास आदि को पढ़ने, सुनने से एंव नाटक को देखने से पाठक या दर्शक को जिस आनन्द की अनुभूति होती है, उसे ‘रस’ कहते हैं ।
या
काव्य को पढ़ने या नाटक को देखने से तथा कथन का श्रवण करने से जिस आनन्द की प्राप्ती होती हैं, उसे ‘रस’ कहते हैं ।
* रस के कितने अंग हैं और क्या - क्या हैं ?
(रसागं का अर्थ है – रस का अंग)
उत्तर – रस के चार अंग हैं –
क. स्यायी भाव
ख. विभाव
ग. अनुभाव और
घ. व्यभिचारी या संचारी भाव
* स्थायी भाव किसे कहते हैं ?
उत्तर – जो भाव हमारे ह्रदय में प्राय:सदा निहित रहते हैं, परन्तु किसी विशेष वस्तु, व्यक्ति और स्थान को देखकर प्रकट हो जाते है, उसे स्थायी भाव कहा जाता हैं । जैसे – क्रोध, भय, शौक, उत्साह, हास, रति, घृणा आदि ।
या
सह्रदय के ह्रदय में जो भाव स्थायी रूप से निवास करते हैं, उसे स्थायी भाव कहा जाता हैं । जैसे – क्रोध, भय, शौक, उत्साह, हास, रति, घृणा आदि ।
* विभाव किसे कहते हैं ?
उत्तर – वे भाव जो स्यायी भाव को जागृत करने में सहायता प्रदान करते हैं, उन्हे विभाव कहते हैं ।
या
जिस वस्तु, व्यक्ति और स्थान को देखकर स्यायी भाव जागृत (उत्पन्न) होता है, उन्हें विभाव कहते हैं ।
या
स्थायी भाव को जागृत (उत्पन्न) करने वाले कारणों को विभाव कहते हैं ।
विभाव के दो भाग हैं –
आलम्बन विभाव और उद्यीपन विभाव ।
आलम्बन विभाव – वे विभाव जो स्यायी भाव को पहली बार जागृत करते है, उन्हें आलम्बन विभाव कहते हैं ।
उद्यीपन विभाव – वे विभाव जो जागृत हुए स्यायी भाव को और अधिक जागृत करने में सहायता करते है, उन्हें उद्यीपन विभाव कहते हैं ।
* अनुभाव किसे कहते हैं ?
उत्तर – वे भाव जो स्यायी भाव के जागृत होने के बाद आश्रय के व्दारा किए गए चेष्टाओं को अनुभाव कहते हैं ।
या
अनुभाव का शाब्दिक अर्थ है भावों के पीछे या पाश्चात्य संचरण करने वाली गतिविधि ।
अनुभाव के चार प्रकार हैं –
क. कायिक
ख. मानसिक
ग. सात्विक और
घ. वाचिक
कायिक – शारीरिक चेष्टा करते हैं ।
मानसिक – हर्ष – विवाद ।
सात्विक – सात्विक भाव वे है जो आश्रय को अपने आप पर नियत्रण नहीं होता हैं । सात्विक अनुभाव आठ हैं । जैस : 1. स्तम्भ (खूटा), 2. स्वेद (पसीना), 3. रोमांच, 4. स्वर भंग (हर्ष में क्रोध, प्रेम), 5. वेपथु (कापँना), 6. वैवर्ण्या, 7. अश्रु और 8. प्रलय ।
वाचिक – आश्रय की वाणी से जो कुछ होता है, वह वाचिक हैं ।
व्यभिचारी या संचारी भाव – जो स्यायी भाव की पुष्टि करने के लिए एक से अधिक भावों के साथ तत्क्षण अपना सम्पर्क स्थापित करते है, उन्हें व्यभिचारी या संचारी भाव कहते हैं । इसकी स्थिती सागर में उत्पान होने वाले लहर के समान है, जो सागर में उत्पान होकर सागर में ही समाप्त हो जाती हैं । व्यभिचारी या संचारी भाव की संख्या 33 हैं ।